कोरोना में प्लाज्मा थरेपी #Human-Blood#

कोरोना से संक्रमित होकर ठीक हो चुके व्यक्ति के शरीर से प्लाज्मा (Human-Blood) निकालकर, दुसरे संक्रमित व्यक्ति के शरीर में इंजेक्शन की मदद से इंजेक्ट किया जाता है जो संक्रमित व्यक्ति को उभरने में मदद करता है ऐसा करना ही प्लाज्मा थरेपी कहलाता है लेकिन प्लाज्मा थरेपी में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना होगा –

human blood
कोरोना में प्लाज्मा थरेपी

मानव रक्त (Human Blood)

  1. रक्त एक तरल संयोजी उत्तक है
  2. मानव शरीरी में रक्त की मात्रा (Quantity of blood in our body) शरीर के भार का लगभग 7 % होती है
  3. रक्त एक क्षारीय विलयन का है, जिसका pH मान 7.4 होता है
  4. एक व्यस्क मनुष्य में औसतन 5 – 6 लीटर रक्त होता है
  5. महिलाओं में पुरुषों की तुलना में 1/2 लीटर रक्त कम होता है

रक्त में दो प्रकार के पदार्थ पाये जाते है – प्लाज्मा और रुधिराणु

प्लाज्मा (Plasma) < प्लाज्मा थरेपी

यह रक्त का अजीवित तरल भाग है रक्त का लगभग 60% भाग प्लाज्मा होता है इसका 90% भाग पानी, 7% प्रोटीन, 0.9% लवण और 0.1% ग्लूकोज होता है शेष पदार्थ बहुत कम मात्रा में होता है

प्लाज्मा के कार्य :

पचे हुए भोजन एवम हार्मोन का शरीर में संवहन प्लाज्मा के द्वारा ही होता है

सेरम (Serum) : जब प्लाज्मा में से फाईब्रिनोजेन नामक प्रोटीन निकाल लिया जाता है, तो शेष प्लाज्मा को सेरम कहा जाता है

रुधिराणु (Blood corpuscles) < प्लाज्मा थरेपी

यह रक्त का शेष 40% भाग होता है इसे तीन भागों में बांटते है – लाल रक्त कण (RBC), श्वेत रक्त कण (WBC) और रक्त बिम्बाणु (Blood platelets)

लाल रक्त कण (RBC) < प्लाज्मा थरेपी

(RBCs) – Red Blood Corpusles or Erythrocytes) :

  1. स्तनधारियों के लाल रक्त कण उभयावतल होते है इसमें केन्द्रक नही होता है अपवाद – ऊंट एवम लामा नामक स्तनधारी की RBCs में केन्द्रक पाया जाता है
  2. RBCs का निर्माण अस्थिमज्जा में होता है प्रोटीन, आयरन विटामिन B(12) एवम फोलिक अम्ल RBCs के निर्माण में सहायक होते है (भ्रण अवस्था में इसका निर्माण यकृत और प्लीहा में होता है)
  3. इसका जीवनकाल 20 से 120 दिन का होता है
  4. इसकी मृत्यु यकृत (lever) और प्लीहा (Spleen) में होती है, इसलिए यकृत और प्लीहा को RBCs का कब्र कहा जाता है
  5. इसमें हीमोग्लोबिन होता है, जिसमे हिम (Heam) नामक रंजक (Dye) होता है इसके कर्ण रक्त का रंग लाल होता है ग्लोबिन (Globin) लौह युक्त प्रोटीन है, जो आक्सीजन एवम कार्बन डाईआक्साइड से संयोग करने की क्षमता रखता है
  6. हीमोग्लोबिन में पाया जाने वाला लौह योगिक हिमेटिन है

RBCs का मुख्य कार्य :

  1. शरीर की हर कोशिका में आक्सीजन पहुचाना एवम कार्बन डाईआक्साइड को वापस लाना है
  2. हीमोग्लोबिन की मात्रा कम होने पर रक्तक्षीणता (Anaemia) रोग हो जाता है
  3. सोते वक्त RBCs 5% कम हो जाता है एवम जो लोग 4200 m की ऊंचाई पर होते है, उनके RBCs में 30 % की वृद्धि हो जाती है
  4. RBCs की संख्या हीमोसाइटोमीटर से ज्ञात की जाती है

श्वेत रक्त कण < प्लाज्मा थरेपी

(WBC – White Blood Corpuscles or Leucocytes)

  • आकार और रचना में यह अमीबा (Amoeba) के समान होता है इसमें केन्द्रक रहता है
  • इक निर्माण अस्थि-मज्जा (Bone marrow), लिम्फ नोड (lymph node) और कभी-कभी यकृत (liver) एवम प्लीहा (Spleen) में भी होता है
  • इसका जीवनकाल 2 – 4 दिन का होता है इसकी मृत्यु रक्त में ही हो जाती है
  • इसका मुख्या कार्य शरीर को रोगों के संक्रमण से बचाना है
  • WBC का सबसे अधिक भाग (60-70%) न्युट्रोफिल्स कणिकाओ का बना होता है न्युट्रोफिल्स कणिकाए रोगाणुओं तथा जीवाणुओं का भक्षण करती है

रक्त बिम्बाणु < प्लाज्मा थरेपी

(Blood platelets or Thrombocytes) :

  • यह केवल मनुष्य एवम अन्य स्तनधारियों के रक्त में पाया जाता है
  • इसमें केन्द्रक नही होता है इसका निर्माण अस्थिमज्जा (Bone marrow) में होता है
  • इसका जीवनकाल 3 से 5 दिन का होता है इसकी मृत्यु प्लीहा (Spleen) में होता है
  • इसका मुख्य कार्य रक्त के थक्का बनाने में मदद करना है
  • डेंगू ज्वर के कारण मानव शरीर में प्लेटलेट्स की कमी हो जाती है

रक्त के कार्य

  1. शरीर के ताप को नियन्त्रण तथा शरीर को रोगों से रक्षा करना
  2. शरीर के वातावरण को स्थायी बनाये रखना तथा घावों को भरना
  3. रक्त का थक्का बनाना
  4. आक्सीजन, कार्बनडाईआक्साइड, पचा हुआ भोजन, उत्सर्जी पदार्थ एवम हार्मोन का संवहन करना
  5. लेगिक वरण में सहायता करना तथा विभिन्न अंगों में सहयोग स्थापित करना
  6. रुधिर प्लाज्मा के प्रोथ्रोम्बिन तथा फाईब्रिनोजेन का निर्माण यकृत में विटामिन K की सहायता से होता है विटामिन K रक्त के थक्का बनाने में सहायक होता है सामान्यत रक्त का थक्का 2-5 मिनट में बन जाता है
  7. रक्त के थक्का बनाने के लिए अनिवार्य प्रोटीन फाईब्रिनोजन है

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मनुष्य के रक्त वर्ग (Blood group) < प्लाज्मा थरेपी

  • रक्त समूह की खोज कार्ल लेंडस्टीनर ने 1900 ई में किया था इसके लिए इन्हें सन 1930 ई में नोबेल पुरस्कार मिला
  • मनुष्यों के रक्तो की भिन्नता का मुख्य कारण लाल रक्त कण (RBC) में पायी जाने वाली गलाईकोप्रोटीन है, जिसे एंटीजन (Antigen) कहते है
  • एंटीजन दो प्रकार के होते है एंटीजन A एवम एंटीजन B
  • एंटीजन या गलाईकोप्रोटीन की उपस्थिति के आधार पर मनुष्य में चार प्रकार के रुधिर वर्ग होते है –
  1. जिसमें एंटीजन A होता है – रुधिर वर्ग A
  2. जिसमें एंटीजन B होता है – रुधिर वर्ग B
  3. जिसमें एंटीजन A और B दोनों होता है – रुधिर वर्ग AB
  4. जिसमें कोई एंटीजन नहीं होता है – रुधिर वर्ग O
  • किसी एंटीजन की अनुपस्थिति में एक विपरीत प्रकार की प्रोटीन रुधिर प्लाज्मा में पायी जाती है इसको एंटीबाड़ी कहते है यह भी दो प्रकार होता है एंटीबाड़ी-a एवम एंटीबाड़ी-b

रक्त का आधान (Blood transfusion) – किसको कसे दे प्लाज्मा थरेपी

  1. एंटीजन A एवम एंटीबाड़ी a, एंटीजन B एवम एंटीबाड़ी b एक साथ नहीं रह सकते है ऐसा होने पर ये आपस में मिलकर अत्यधिक चिपचिपे हो जाते है, जिससे रक्त नष्ट हो जाता है इसे रक्त का अभिश्लेष्ण (agglutination) कहते है अत रक्त आधान में एंटीजन तथा एंटीबाड़ी का ऐसा ताल-मेल करना चाहिए जिससे रक्त का अभिश्लेष्ण न हो सके
  2. रक्त-समूह O को सर्वदाता रक्त समूह कहते है , क्योकि इसमें कोई एंटीजन नही होता है एवम रक्त समूह AB को सर्वग्रहता रक्त-समूह कहते है, क्योकि इसमें कोई एंटीबाड़ी नही होता है
  3. Rh-तत्व (Rh-factor) : सन 1940 ई में लेंड स्टीनर और विनर ने रुधिर में एक अन्य प्रकार के एंटीजन का पता लगाया इन्होने रिसस बन्दर में इस तत्व का पता लगाया इसलिए इसे Rh-factor भी कहते है, जिन व्यक्तियों के रक्त में यह तत्व पाया जाता है, उनका रक्त Rh-सहित कहलाता है तथा जिनमें नही पाया जाता, उनका रक्त Rh-रहित कहलाता है
  4. रक्त आधान के समय Rh-factor की भी जाँच की जाती है Rh+ को Rh+ का रक्त एवम Rh- को Rh- का रक्त ही दिया जाता है
  5. यदि Rh+ रक्त वर्ग का रक्त Rh- रक्त वर्ग वाले व्यक्ति को दिया जाता हो, तो प्रथम बार कम मात्रा होने के कर्ण कोई प्रभाव नहीं पड़ता किन्तु जब दूसरी बार इसी प्रकार रक्ताधान किया गया तो अभीश्लेष्ण के कारण Rh- वाले व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है
  6. एरिथ्रोब्लास्टोसिस फिटेलिस (Erythro-blastosis Fetalis) : यदि पिता का रक्त Rh+ हो ठता माता का रक्त Rh- हो तो जन्म लेने वाले शिशु की जन्म से पहले गर्भावस्था में या जन्म के तुरंत बाद मृत्यु हो जाती है (ऐसा प्रथम सन्तान के बाद की सन्तान होने पर होता है)

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