President of india

President of india list में आपको भारत के प्रथम राष्ट्रपति ड़ॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर रामनाथ कोविंद तक नाम के साथ उनका कार्यकाल भी बताया गया है President of india में आपको राष्ट्रपति के वेतन एवं भत्ते, राष्ट्रपति की चुनाव प्रक्रिया, और President of india के कार्यो के बारे में भी जानने को मिलेगा तो चलिए सुरु करते है

President of india
President of india

जैसा कि आप जानते है कि भारत में संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया है। अतः राष्ट्रपति (President of india) नाममात्र की कार्यपालिका है तथा प्रधानमंत्री व उसका मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका होती है। राष्ट्पति देश का संवैधानिक प्रधान होता है और वह देश का प्रथम नागरिक कहलाता है। भारतीय कार्यपालिका की शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है।

President of india list – President of india

 क्र.भारत के राष्ट्रपति
1ड़ॉ. राजेंद्र प्रसाद26 जनवरी 1950 से 13 मई 1962 
2डॉ. एस. राधाकृष्णन 13 मई 1962 से 13 मई 1967
3डा. जाकिर हुसैन13 मई 1967 से  3 मई 1969 
4वी. वी. गिरि24 अगस्त 1969 से 24 अगस्त 1974 
5फखरुद्दीन अली अहमद24 अगस्त 1974 से 11 फरवरी 1977 
6नीलम संजीव रेड्डी 25 जुलाई 1977 से 25 जुलाई 1982 
7ज्ञानी जैल सिंह 25 जुलाई 1982 से 25 जुलाई 1987 
8आर. वेंकटरमण25 जुलाई 1987 से 25 जुलाई 1992 
9डा. शंकर दयाल शर्मा25 जुलाई 1992 से 25 जुलाई 1997 
10के. आर. नारायण25 जुलाई 1997 से 25 जुलाई 2002 
11डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम25 जुलाई 2002  से 25 जुलाई 2007 
12प्रतिभा पाटिल25 जुलाई 2007  से  25 जुलाई 2012 
13प्रणव मुखर्जी25 जुलाई 2012 से 25 जुलाई 2017 
14राम नाथ कोविंद25 जुलाई 2017 से अब तक 

वी. वी. गिरि 3 मई, 1969 से 20 जुलाई, 1969 ईस्वी तक, न्यायमूर्ति मुहम्मद हिदायतुल्ला 20 जुलाई, 1969 ईस्वी से 24 अगस्त, 1969 ईस्वी तक एवं बी. डी. जत्ती 11 फरवरी, 1977 से 25 जुलाई, 1977 ईस्वी तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के पद पर रहे।

राष्ट्रपति (President of india) से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें –

  • डा. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। वे लगातार दो बार राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। 
  • डा. एस. राधाकृष्णन लगातार दो बार उपराष्ट्रपति तथा एक बार राष्ट्रपति रहे। 
  • केवल वी. वी. गिरि के निर्वाचन के समय दूसरे चक्र की मतगणना करनी पडी। 
  • केवल नीलम संजीव रेड्डी ऐसे राष्ट्रपति हुए जो एक बार चुनाव में हार गये, फिर बाद में निर्विरोध राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। 
  • भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल हुई। 

राष्ट्रपति-पद की योग्यता :

संविधान के अनुच्छेद 58 के अनुसार कोई व्यक्ति राष्ट्रपति होने योग्य तब होगा, जब वह

  1. भारत का नागरिक हो
  2. 35 वर्ष की आयु पूरी कर चूका हो
  3. लोकसभा का सदस्य निर्वाचित किये जाने योग्य हो।
  4. चुनाव के समय लाभ का पद धारण नहीं करता हो।

(यदि व्यक्ति राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के पद पर हो या संघ अथवा किसी राज्य की मंत्रिपरीषद् का सदस्य हो, तो वह लाभ पद नहीं मन जायेगा)

  • राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचन-मंडल (अनुच्छेद 54) में राज्य सभा, लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य रहते है।
  • राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए निर्वाचन-मंडल के 50 सदस्य अनुमोदन होते है।
  • एक ही व्यक्ति जितनी बार चाहे राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हो सकता है।
  • राष्ट्रपति का निर्वाचन समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और एकल संक्रमणीय मत पद्धति के द्वारा होता है। (अनुच्छेद 55)
  • राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित विवादों का निपटारा उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाता है। निर्वाचन अवैध घोषित होने पर उसके द्वारा किये गए कार्य अवैध नहीं होते है।
  • राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तिथि से पांच वर्ष  तक पद धारण करेगा। अपने पद की समाप्ति के बाद भी वह पद पर तब तक बना रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण नहीं कर लेता है। (अनुच्छेद 56)
  • पद धारण करने से पूर्व राष्ट्रपति को एक निर्धारित प्रपत्र पर भर के मुख्य न्यायाधीश अथवा उसकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश के सम्मुख शपथ लेनी पड़ती है।

राष्ट्रपति निम्न दशाओं में भी पांच वर्ष से पहले भी पद त्याग सकता है –

  1. उपराष्ट्रपति को संबोधित अपने त्यागपत्र द्वारा : यह त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को संबोधित किया जायेगा जो इसकी सूचना लोक सभा के अध्यक्ष को देगा।
  2. महाभियोग द्वारा हटाए जाने पर : महाभियोग के लिए केवल एक ही आधार है, जो अनुच्छेद 61(1) में उल्लेखित है, वह है संविधान का अतिक्रमण।

राष्ट्रपति पर महाभियोग (अनुच्छेद 61)

राष्ट्रपति द्वारा संविधान के प्रावधानों के उललंघन पर संसद के किसी सदन द्वारा उस पर महाभियोग लगाया जा सकता है, परन्तु इसके लिए आवश्यक है कि राष्ट्रपति को 14 दिन पहले लिखित सूचना दी जाये, जिस पर उस सदन के एक चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर हो। संसद के उस सदन, जिसमें महाभियोग का प्रस्ताव पेश है, के दो-तिहाई सदस्यों द्वारा पारित कर देने पर प्रस्ताव दूसरे सदन में जायेगा, तब दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाए गए आरोपों की जाँच करेगा या कराएगा और ऐसी जाँच में राष्ट्रपति के ऊपर लगाए गए आरोपों को सिद्ध करने वाला प्रस्ताव दो-तिहाई बहुमत से पारित हो जाता है, तब राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया पूरी समझी जाएगी और उसी तिथि से राष्ट्रपति को पदत्याग करना होगा।

राष्ट्रपति की रिक्ति को छह महीने के अंदर भरना होता है

जब राष्ट्रपति पद की रिक्ति पदावधि (5 वर्ष) की समाप्ति से हुई है, तो निर्वाचन की समाप्ति के पहले ही कर लिया जायेगा [अनुच्छेद 62(1)] । किन्तु यदि उसे पूरा करने में कोई विलम्ब हो जाता है, तो राज अंतराल न होने पाए इसीलिए यह उपबंध है कि राष्ट्रपति अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी तब तक पद पर बना रहेगा, जब तक उसका उत्तराधिकारी पद धारण नहीं कर लेता है [अनुच्छेद 56(1) ग]। ऐसी दशा में उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य नहीं कर सकेगा।

अन्य आकस्मिकताओं में राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन (अनुच्छेद 70)

जब राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति दोनों का पद रिस्ट हो तो ऐसी आकस्मिकताओं में अनुच्छेद 70 राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन का उपबंध करता है। इसके अनुसार संसद जैसा उचित समझे वैसा उपबंध कर सकती है। इसी उद्देश्य से संसद ने राष्ट्रपति उत्तराधिकार अधिनियम, 1969 ईस्वी पारित किया है जो यह उपबंधित करता है कि यदि उपराष्ट्रपति भी किसी कारणवंश उपलब्ध नहीं है तो उंच्च तम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या उसके नहीं रहने पर उसी न्यायालय का वरिष्ठतम न्यायाधीश, जो उस समय उपलब्ध हो, राष्ट्रपति के कृत्यों को सम्पादित करेगा।

राष्ट्रपति के वेतन एवं भत्ते :

  1. राष्ट्रपति का मासिक वेतन 5 लाख रूपये है।
  2. राष्ट्रपति का वेतन आयकर से मुक्त होता है।
  3. राष्ट्रपति को निःशुल्क निवास-स्थान व संसद द्वारा स्वीकृत अन्य भत्ते प्राप्त होते है।
  4. राष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान उनके वेतन तथा भत्ते में किसी प्रकार की कमी नहीं की जा सकती है।
  5. राष्ट्रपति के लिए 18 लाख रूपये वार्षिक पेंशन निर्धारित किया गया है।

राष्ट्रपति (President of india) के अधिकार एवं कर्तव्य

नियुक्ति संबंधी अधिकार :

राष्ट्रपति निम्न की नियुक्ति करता है –

  1. भारत का प्रधानमंत्री
  2. प्रधानमंत्री की सलाह पर मंत्रिपरीषद् के अन्य सदस्यों,
  3. सर्वोच्च एवं उंच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों
  4. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक
  5. राज्यों के राज्यपाल
  6. मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त
  7. भारत के महान्यायवादी,
  8. राज्यों के मध्य समन्वय के लिए अंतर्राज्यीय परिषद् के सदस्य
  9. संघ्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों
  10. संघीय क्षेत्रों के मुख्य आयुक्तों
  11. वित्त आयोग के सदस्यों भाषा आयोग के सदस्यों
  12. पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्यों
  13. अल्पसंख्यक आयोग के सदस्यों
  14. भारत के राजदूतों तथा अन्य राजनयिकों
  15. अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में रिपोर्ट देने वाले आयोग के सदस्यों आदि

विधायी शक्तियाँ

  1. राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग होता है। इसे निम्न विधायी शक्तियाँ प्राप्त है –
  2. संसद के स्तर को आहूत करने सत्रावसान करने तथा लोकसभा भांग करने संबंधी अधिकार
  3. संसद के एक सदन में या एक साथ सम्मिलित रूप से दोनों सदनों में अभिभाषण करने की शक्ति
  4. लोकसभा के लिए प्रत्येक साधारण निर्वाचन के पश्चात प्रथम स्तर के प्रारम्भ में सम्मिलित रूप से संसद में अभिभाषण करने की शक्ति
  5. संसद द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद ही कानून बनता है।
  6. यदि किसी साधारण विधयक पर दोनों सदनों में कोई असहमति है तो उसे सुलझाने के लिए राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकता है (अनुच्छेद 108)
  7. संसद में निम्न विधेयक को पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सहमति आवश्यक है –
  • नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्य के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन संबंधी विधेयक
  • धन विधेयक (अनुच्छेद 110)
  • संचित निधि में व्यय करने वाले विधेयक [अनुच्छेद 117(3)] ।
  • ऐसे कराधान पर, जिसमें राज्य हित जुड़े है, प्रभाव डालने वाले विधेयक
  • राज्यों के बीच व्यापार, वाणिज्य और समागम पर निर्बन्धन लगाने वाले विधेयक (अनुच्छेद 304)

संसद सदस्यों के मनोनयन का अधिकार :

  1. जब राष्ट्रपति को यह लगे कि लोकसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय के व्यक्तियों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है, तब वह उस समुदाय के दो व्यक्तियों को लोकसभा के सदस्य के रूप में नामांकित कर सकता है (अनुच्छेद 331) ।
  2. इसी प्रकार वह कला, साहित्य, पत्रकारिता, विज्ञान तथा सामाजिक कार्यो में पर्याप्त अनुभव एवं दक्षता रखने वाले व्यक्तियों को राज्यसभा में नामजद कर सकता है [अनुच्छेद 80(3)] ।

अध्यादेश जारी करने की शक्ति :

संसद के स्थगन के समय अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश जारी कर सकता है, जिनका प्रभाव संसद के अधिनियम के समान होता है।  इसका प्रभाव संसद स्तर के शुरू होने के 6 सप्ताह तक रहता है। परन्तु, राष्ट्रपति राज्य सूची के विषयों पर अध्यादेश नहीं जारी कर सकता है, जब दोनों सदन स्तर में होते है, तब राष्ट्रपति को यह शक्ति नहीं होती है।

सैनिक शक्ति :

सैन्य बलों की सर्वोच्च शक्ति राष्ट्रपति में सन्निहित है, किन्तु इसका प्रयोग विधि द्वारा नियमित होता है।

राजनैतिक शक्ति :

दूसरे देशों के साथ कोई भी समझौता या संधि राष्ट्रपति के नाम से की जाती है। राष्ट्रपति विदेशों के लिए भारतीय राजदूतों की नियुक्ति करता है एवं भारत में विदेशों के राजदूतों की नियुक्ति का अनुमोदन देता है।

क्षमादान की शक्ति

संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका परविलंबन, परिहार और लघुकरण की शक्ति प्राप्त है।

  1. क्षमा में दण्ड और बंदीकरण दोनों हटा दिया जाता है तथा दोषी को पूर्णतः मुक्त कर दिया जाता है।
  2. लघुकरण में दण्ड के स्वरूप को बदलकर कम कर दिया जाता है, जैसे मृत्युदंड का लघुकरण कर कठोर या साधारण कारावास में परिवर्तित करना।
  3. परिहार में दंड की प्रकृति में परिवर्तन किये बिना उसकी अवधि कम कर दी जाती है। जैसे 2 वर्ष के कठोर कारावास को 1 वर्ष के कठोर कारावास में परिहार करना।
  4. प्रविलम्भ में किसी दंड पर रोक लगाना है ताकि दोषी व्यक्ति क्षमा याचना कर सके। विराम में किसी दोषी के सजा को विशेष स्थिति में कम कर दिया जाता है जैसे गर्भवती स्त्री की सजा को कम कर देना।

राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियाँ :

आपातकाल से संबंधित उपबंध भारतीय संविधान के भाग – 18 के (अनुच्छेद 352 से 360) के अंतर्गत मिलता है। मंत्रीपरीषद् के परामर्श से राष्ट्रपति तीन प्रकार के आपात लागु कर सकता है –

  1. युद्ध या बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण लगाया गया आपात (अनुच्छेद 352)
  2. राज्यों में सांविधानिक तंत्र के विफल होने से उत्पन्न आपात (अनुच्छेद 356)
  3. वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360)

राष्ट्रपति को परामर्श लेने का अधिकार :

राष्ट्रपति किसी सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से अनुच्छेद 143 के अधीन परामर्श ले सकता है, लेकिन वह यह परामर्श मानने के लिए बाध्य नहीं है।

राष्ट्रपति द्वारा जेबी वीटो का प्रयोग :

राष्ट्रपति की किसी विधेयक पर अनुमति देने या न देने के निर्णय लेने की सीमा का आभाव होने के कारण राष्ट्रपति जेबी वीटो का प्रयोग कर सकता है, क्योंकि अनुच्छेद 111 केवल यह कहता है कि यदि राष्ट्रपति विधेयक लौटना चाहता है, तो विधेयक को उसे प्रस्तुत किये जाने के बाद यथाशीघ्र लौटा देगा। जेबी वीटो शक्ति का प्रयोग का उदाहरण है, 1986 ईस्वी में संसद द्वारा पारित भारतीय डाकघर संशोधन विधेयक, जिस पर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने कोई निर्णय नहीं लिया। तीन वर्ष पश्चात, 1989 ईस्वी में अगले राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने इस विधेयक को नई राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के पास पुनर्विचार हेतु भेजा परन्तु सरकार ने इसे रद्द करने का फैसला लिया।

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